Share your story

आप अपने जीवन का घटनाक्रम प्रेरणादायक लेख/कविता/कहानी/कथन के तौर पर , जो आपके अपने अनुभवों का निचोड़ होंगे ; हमें लिख भेजिए : adbhutlife97@gmail.com पर ।

सुबह जल्दी उठने की आदत कैसे डालें ?

सुबह जल्दी उठने की आदत कैसे डालें - __________________________
दोस्तों ! हम सभी जानते हैं कि सुबह जल्दी उठना दिनभर में हमारे समय की जितनी बचत करता है उतना ही मुश्किल भी होता है ! खासकर जब यह आदत बचपन से न हो : तो यहाँ पर प्रस्तुत ( अनुवादित ) लेख से आप जानेंगे कि सुबह जल्दी उठने की आदत कैसे डाल सकते हैं , इसको STEVE PAVLINA ने लिखा है - How to Become an Early Riser  .
                                        ★ सुबह जल्दी उठने की आदत कैसे डालें -:
सूर्योदय होने से पहले उठना अच्छा है , इस प्रकार की आदतें स्वास्थ्य ,धन और बुद्धिमत्ता प्रदान करती हैं ।
– अरस्तु
क्या सुबह उठने वाले लोग जन्म से ही सुबह उठते हैं या ऐसी आदत बना लेते है ? मेरे मामले में तो यह आदत निश्चित तौर पर बनाई गयी है । जब मैं 20 साल के आस-पास था , तो शायद ही कभी मुश्किल से आधी रात होने से पहले सोने गया होऊँगा , और लगभग हमेशा ही देर तक सोता रहता था । मैं अधिकतर अपनी दिनचर्या दोपहर होने तक करता रहता था । लेकिन कुछ समय बाद मैं सफलता और सुबह जल्दी उठने के बीच के संबंध को ignore नहीं कर  पाया, अपनी जिदगी में भी । उन दुर्लभ अवसरों पर जब भी मैं जल्दी उठा हूँ तो मैंने पाया है कि मेरी कार्य करने की क्षमता लगभग हमेशा ही ज्यादा रही है , सिर्फ सुबह के वक़्त ही नहीं बल्कि पूरे दिन और मुझे खुद अच्छा होने का एहसास भी हुआ है तो एक active goal-achiever होने के नाते मैंने सुबह जल्दी उठने की आदत डालने का फैसला किया । मैंने अपनी अलार्म घड़ी 5 बजे पर सेट कर दी…
— और अगली सुबह मैं दोपहर से बस थोड़ा पहले ही उठा ।
मैंने फिर कई बार कोशिश की, पर  कुछ भी फायदा नहीं हुआ । मुझे लगा कि शायद मैं सुबह उठने वाली जीन के बिना ही पैदा हुआ हूँ  । जब भी मेरा अलार्म बजता तो मेरे मन में पहला ख्याल यह आता कि मैं उस शोर को बंद करूँ और सोने चला जाऊँ । कई सालों तक मैं ऐसा ही करता रहा ,पर एक दिन मुझे sleep research पता लगी जिससे मैंने जाना कि मैं इस समस्या को गलत तरीके से हल कर रहा था । और जब मैंने ये ideas लगाना चालू किए तो मैं लगातार सुबह उठने में सफल होने  लगा ।

सुबह उठने की आदत , गलत strategy के साथ डालना मुश्किल है पर सही strategy के साथ ऐसा करना अपेक्षाकृत आसान है
सबसे common गलत strategy है कि  आप यह सोचते हैं कि यदि सुबह जल्दी  उठाना है तो बिस्तर पर जल्दी जाना सही रहेगा । फिर आप देखते हैं कि आप कितने  घंटे की नींद लेते हैं, और सभी चीजों को  कुछ घंटे पहले खिसका देते हैं । यदि आप  अभी आधी रात से सुबह 8 बजे तक सोते हैं  तो अब आप निर्णय लेते हैं कि आप 10 बजे रात को सोने जायेंगे और सुबह 6 बजे उठेंगे । ये सुनने में तर्कसंगत लगता है पर ज्यादातर  ये तरीका काम नहीं करता ।
ऐसा लगता है कि sleep patterns को ले  कर दो अवधारणाएं हैं , एक है कि आप हर रोज़ एक ही वक़्त पर सोइए और उठिए ; ये  ऐसा है जैसे कि दोनों तरफ अलार्म घड़ी लगी  हो और आप हर रात उतने ही घंटे सोने का प्रयास करते हैं । आधुनिक समाज में जीने के  लिए यह व्यवहारिक लगता है । हमें अपनी  योजना का सही अनुमान होना चाहिए। और  हमें पर्याप्त आराम भी चाहिए ।

दूसरी अवधारणा कहती है कि आप अपने शरीर की ज़रुरत को सुनिए और जब आप  थक जायें तो सोने चले जाइये और तब उठिए  जब naturally आपकी नींद टूटे । इस अवधारणा की जड़ biology में है। हमारे शरीर को पता होना चाहिए कि हमें कितना  rest चाहिए, इसलिए हमें उसे सुनना चाहिए ।
Trial और error से मुझे पता चला कि दोनों  ही तरीके पूरी तरह से उचित sleep patterns नहीं देते । अगर आप productivity की चिंता करते हैं तो दोनों  ही तरीके गलत हैं । उसके कारण ये हैं :
यदि आप एक निश्चित समय पर सोते हैं तो  कभी-कभी आप तब सोने चले जायेंगे , जब  आपको बहुत नींद न आ रही हो । यदि  आपको सोने में 5 मिनट से ज्यादा लग रहे , हों तो इसका मतलब है कि आपको अभी  ठीक से नींद नहीं आ रही है । आप बिस्तर पर लेटे-लेटे अपना समय बर्बाद कर रहे हैं ; सो नहीं रहे हैं । एक और समस्या ये है कि  आप सोचते हैं कि आपको हर रोज़ उतने ही  घंटे की नींद चाहिए , जो कि गलत है । आपको हर दिन एक बराबर नींद की ज़रुरत नहीं होती ।
यदि आप उतना सोते हैं जितना की आपका शरीर आपसे कहता है तो शायद आपको
जितना सोना चाहिए उससे ज्यादा सोएँगे -कई मामले में तो कहीं ज्यादा, हर हफ्ते 10-15 घंटे ज्यादा ( एक पूरे जागने वाले दिन के  बराबर ) ज्यादातर लोग जो ऐसे सोते हैं वो हर दिन 8+ घंटों सोते हैं , जो आमतौर पर बहुत ज्यादा है और यदि आप रोज़ अलग-अलग समय पर उठ रहे हैं तो आप सुबह की planning सही से नहीं कर पाएँगे , और  चूँकि कभी-कभी हमारी natural rhythm घड़ी से नहीं मिलती तो आप पायंगे कि आपका सोने का समय  आगे बढ़ता जा रहा है ।
मेरे लिए दोनों अवधारणाओं को combine करना कारगार साबित हुआ , ये बहुत आसान  है , और बहुत से लोग जो सुबह जल्दी उठते हैं ,वो बिना जाने ही ऐसा करते हैं ,पर मेरे लिए तो यह एक महत्त्वपूर्ण बौद्धिक निर्णय था
उपाय ये था की बिस्तर पर तभी जाओ जब  नींद आ रही हो ( तभी जब नींद आ रही हो ) और एक निश्चित समय पर उठो ( हफ्ते के सातों दिन ), इसलिए मैं हर रोज़ एक ही  समय पर उठता हूँ (5 am), पर मैं हर रोज़  अलग-अलग समय पर सोने जाता हूँ ।
मैं बिस्तर पर तब जाता हूँ जब मुझे बहुत  तेज नींद आ रही हो । मेरा sleepiness test ये है कि यदि मैं कोई किताब ऊँघे बिना एक-दो पन्ने नहीं पढ़ पाता हूँ तो इसका मतलब है  कि मैं बिस्तर पर जाने के लिए तैयार हूँ । ज्यादातर मैं बिस्तर पर जाने के 3 मिनट के  अन्दर सो जाता  हूँ ; मैं आराम से लेटता हूँ  और मुझे तुरंत ही नींद आ जाती है । कभी- कभी मैं 9:30 पर सोने चला जाता हूँ और  कई बार आधी रात तक जगा रहता हूँ । अधिकतर मैं 10-11 बजे रात के बीच सोने चला जाता हूँ । अगर मुझे नींद नहीं आ रही  होती तो मैं तब तक जगा रहता हूँ जब तक  मेरी आँखें बंद न होने लगे । इस वक़्त पढ़ना  एक बहुत ही अच्छा काम है , क्योंकि यह  जानना आसान होता है कि अभी और पढ़ना  चाहिए या अब सो जाना चाहिए !
जब हर दिन मेरा अलार्म बजता है तो पहले मैं  उसे बंद करता हूँ , कुछ सेकंड्स तक  stretch करता  हूँ , और उठ कर बैठ जाता  हूँ । मैं इसके बारे में सोचता नहीं , मैंने ये  सीखा है कि मैं उठने में जितनी देर लगाऊँगा,उतना अधिक chance है कि मैं फिर से सोने  की कोशिश करूँगा । इसलिए एक बार अलार्म बंद  हो  जाने के  बाद मैं अपने दिमाग में ये  वार्तालाप नहीं होने देता कि और देर तक  सोने के क्या फायदे हैं । यदि मैं सोना भी  चाहता हूँ , तो भी मैं तुरंत उठ जाता हूँ ।

इस approach को कुछ दिन तक use करने  के बाद मैंने पाया कि मेरा sleep patterns एक natural rhythm में सेट हो गया हैं । अगर किसी रात मुझे बहुत कम नींद मिलती  तो अगली रात अपने आप ही मुझे जल्दी नींद  आ जाती और मैं ज्यादा सोता और जब मुझमें खूब energy होती तथा मैं थका हुआ  नहीं होता तो कम सोता , मेरे शरीर ने ये  समझ लिया कि कब मुझे सोने के लिए भेजना है क्योंकि उसे पता है कि मैं हमेशा उसी वक़्त  पर उठूँगा और उसमें कोई समझौता नहीं  किया जा सकता ।
इसका एक असर ये हुआ कि मैं अब हर रात  लगभग 90 मिनट कम सोता , पर मुझे महसूस होता है कि मैंने पहले से ज्यादा आराम लिया  है । मैं अब जितनी देर तक बिस्तर पर होता  करीब उतने देर तक सो रहा होता ।

मैंने पढ़ा है कि ज्यादातर अनिद्रा रोगी  वो लोग होते हैं जो नींद आने से पहले ही बिस्तर पर चले जाते हैं । यदि आपको नींद न आ रही हो और ऐसा लगता हो कि आपको  जल्द ही नींद नहीं आ जाएगी , तो उठ जाइये और कुछ देर तक जगे रहिये । नींद को तब तक रोकिए जब तक आपका शरीर ऐसे तत्त्व न छोड़ने लगे जिससे आपको नींद आ जाये । अगर आप तभी बिस्तर पर जाएँ जब आपको नींद आ रही हो और
एक निश्चित समय उठें  तो आप अनिद्रा का इलाज कर पाएंगे ! पहली रात आप देर तक जागेंगे ,पर बिस्तर पर जाते ही आपको नींद आ जाएगी , पहले दिन आप थके हुए हो सकते हैं क्योंकि आप देर से सोये और  बहुत जल्दी उठ गए , पर आप पूरे दिन  काम करते रहेंगे और दूसरी रात जल्दी सोने चले जायेंगे ; कुछ दिनों बाद आप एक ऐसे नियम में स्थित हो जायेंगे जिसमें आप  लगभग एक ही समय बिस्तर पर जाएँगे ; और तुरंत सो जायंगे ।
इसलिए यदि आप जल्दी उठना चाहते हैं या अपने सोने के समय को नियंत्रित करना चाहते हैं , तो यह कोशिश कीजिए : सोने तभी जाइये जब आपको सच-मुच बहुत नींद आ रही हो और हर दिन एक निश्चित समय पर उठिए ।

Previous
Next Post »

Comments

रितिक जी, सबसे पहले मै आपको धन्यवाद कहना चाहुंगा क्योंकि अपने जो पोस्ट शेयर किये हैं वो बहुतहि सुन्दर है ! हिंदी भाषा के प्रति आपकी रूचि से मैं बहुत हि प्रभावित हुआ हूँ, मई ये यक़ीनन कह सकता हु कि हिंदी भाषा के अलावा भी आपको दूसरे भाषाओ का ज्ञान है ! मैं बस आपसे इतना कहना चाहुंगा कि अपने जो भी पोस्ट शेयर किये है वो बहुत हि अच्छे और उपयोगी पोस्ट है , मैं लगभग आपके सभी पोस्ट को पढ़ लिया हु आशा करता हुकि इसीतरह से अच्छे पोस्ट भविष्य मै आप शेयर करोगी जिनका आनंद और लाभ मैं पढ़ कर उठा पाउँगा ! आखिरी में आपको एक बार और धन्यवाद कहना चाहुंगा !
prabhudayal sahu
Hello, आपके ब्लाॅग की रचनाएं प्रेरक एवं आत्मविश्वास को जगाने वाली है साथ ही एक पाॅजिटिव सामग्री भी। आपके ब्लाॅग को हमने यहां लिस्टेड किया है। Best Motivational Blogs
i Blogger
हमें आपकी​ पोस्ट बहुत पसंद आई
Manoj Gaur
बिल्कुल सटीक.... सार्थक प्रस्तुति...
Sudha Devrani
सारगर्भित आलेख।
Ravindra Singh Yadav